{ COVID-19 महामारी ने पूरी दुनिया की कार्यप्रणाली को प्रभावित तो किया ही, उस पर एक बड़ा सा प्रश्न-चिह्न भी लगा दिया है। ये महामारी उन लोगों के लिए आपदा बनकर आई है जिनका जीवन हमेशा से एक हादसा ही समझा जाता रहा है, वहीं कुछ लोगों के लिए, जिनके पास हमेशा से ही अवसर उपलब्ध रहा है, आज भी ये अवसर के रूप में ही आया है। गाँव, कस्बा, नगर, महानगर, राजधानी, अमीर-गरीब, साक्षर-निरक्षर ने कोरोना को कैसे महसूस किया, उन्हीं भावों को कोविद-1 अर्थात विद्वान-1 से लेकर कोविद-19 यानी विद्वान-19 तक उन्नीस दृश्यों की एक दृश्यमाला के रूप में प्रस्तुत करने की योजना है। यहाँ प्रत्येक पात्र या अनुभवकर्ता अपनी जीवनानुभूतियों के आधार पर कोरोना को समझता है इसलिए उसे कोविद की संज्ञा दी गयी है।}
(यूपी का एक गाँव, जहाँ शहर की हवा पहुँचते-पहुँचते अपना दम तोड़ देती है और वहाँ का रास्ता पूछने पर गूगल भी रामपुरी लेकर दौड़ाने लगता है। उसी गाँव में एक दादी जो नब्बे साल की उम्र मोदी-2.0 से पहले ही पार कर चुकी हैं, अपने द्वारे बैठ किसी का रास्ता देख रही हैं। शहर की किसी फैक्ट्री में काम करने वाला एक मजदूर जो कि उनका पड़ोसी है, कल ही गाँव लौटा है।)
पड़ोसी - काकी, दुआरे पे बईठ के सवेरे-सवेरे केहके राह देखति अहौ ?
दादी - अरे बछुआ, सुना है कऊनों कोरुना देउता अउतार लिहे हैं। उनहिन के राह देखित अहै।
पड़ोसी - ई कपड़ा काहे लपेटे हौ मुहवा मा ?
दादी- सुने हन की कपड़ा लपेटे से जल्दी आवत्थीं। एही बरे ई कलुआ कपड़ा लपेटे हन की जल्दी से अपने गाँव मा आवें।
पड़ोसी- अरे काकी! उ देउता न आय उ तौ राक्षस आय। ओहका 'बाइरस' कहत्थीं। बहुत खतरेबुल है ऊ तौ।
दादी- बछुआ हमका भरमाव न, हम सब जानित अहै। हम ईस्कूल भले नहीं गईना लेकिन तोहरे काका के साथ दुनिया खूब अच्छे से देखे हन।
पड़ोसी - अच्छा ठीक अहै, लेकिन ई बताव कि तोहरे घर मा न तौ टीबी अहै न रेडियो तौ तुमका के बताइस रहै कोरुना देउता के बारे मा।
दादी- ठकुराइनी के हियाँ गयी रहिन तौ उनहिन बताइन हैं। सहर से उनके लगे टेलीखून आवा रहा।
पड़ोसी- काकी टेलीखून नहीं टेलीफ़ून कहत्थीं ओहका। अच्छा ई बताव, कोरुना देउता के आए से तुमका का फाइदा होई ?
दादी- उइ एक बार हमरे हियाँ आय जाँय बस। जे हमार तांबे के लोटवा चोराए होई ओहका दिक कइके चले जाँय, चहे फालिस मरुवाय दें। अऊर कऊनों अरज नहीं न हमार। बस नियांव चाही हमका।
